अंधविश्वास पड़ा भारी

एक बन्दरपुर नाम माँ गांव था वह पे सब दरवाजे खुले रख के सोते थे उनका विश्वास था की हमारा भगवान् हमारी देख रेख करता है इसलिए कोई चोरी नहीं हो सकती यहाँ से और उस गांव पिछले ३० साल में एक बार भी चोरी नहीं हुए है.

एक चोर जिसने एक लोकल बैंक को लुटा और वो चोर रुकने के लिए एक जगह ढूंढ रहे थे तभी वो उस बन्दरपुर गांव का नाम सुने और उन्हें लगा यहाँ पे तो उन लोगो की लाटरी लगने वाली.

वह चोर वहां पे एक किराए का मकान धुंध रहे थे उन लोगो को एक छिपने के लिए जगह भी चाहिए थी और उस गांव में थोड़ा रुक के सब चोरी कहा कहा से करे उसकी प्लानिंग कर रहे थे .

उन्हें एक घर मिल ता है जहा वह रुक सके वह अपने मकान मालिक से पूछता है यहाँ पर सभी लोग दरवाजा बंद करके क्यों नहीं सोते तो वो मकान मालिक कहता है यहाँ के कुल गुरु हमारे घर की रक्षा करते है.

तो वह चोर बोलता है यह सब नौटंकी है ऐसा कुछ नहीं होता तो वो मकान मालिक कहता है ये तो आदमी पे देपेंद करता है वो यातो इन सब चीज़ो को माने या ना माने तुम नहीं मानते में मानता हु इसमें कुछ बुराई नहीं है यह सब वो चोर के दिमाग से ऊपर जाता है. और कहता है ठीक है.

तब एक रात को वो चोर सब घर से कीमती कीमती चीज़ चोरी कर लेते है और उस गांव से नौ दो ग्यारह हो जाते है तब उन गांव वालो की आँखे खुलती है और वहा से उस गांव में हर रोज सब लोग दरवाजा बंद करके सोते है.

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